भारत की संसद

भारत संघ राज्यों से मिलकर बना है, जो संपूर्ण प्रभुतासंपन्न, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है और यहां संसदीय प्रणाली की सरकार है। संसद भारत का सर्वोच्च विधायी निकाय है। इसमें राष्ट्रपति - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं और दोनों सदन- लोकसभा (लोगों का सदन) - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं और राज्यसभा (राज्यों की परिषद) - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं शामिल हैं। राष्ट्रपति के पास संसद का अधिवेशन बुलाने और स्थगित करने के साथ ही लोकसभा को भंग करने की शक्ति भी है।
| भारतीय संसद | ||
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भारत का संविधान 26 जनवरी, 1950 को प्रवृत्त हुआ। नए संविधान के तहत प्रथम आम चुनाव वर्ष 1951-52 में आयोजित किए गए थे तथा प्रथम निर्वाचित भारतीय संसद - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं अप्रैल, 1952 में अस्तित्व में आई। संविधान का अनुच्छेद 87(1) उपबंध करता है- " राष्ट्रपति लोक सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन के पश्चात प्रथम सत्र के आरंभ में एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण करेगा और संसद को उसके आह्वान के कारण बताएगा।'' लोक सभा के लिए प्रत्येक साधारण निर्वाचन होने के पश्चात प्रथम सत्र की दशा में, राष्ट्रपति, सदस्यों द्वारा शपथ लिए जाने अथवा प्रतिज्ञान किए जाने और अध्यक्ष के चुने जाने के पश्चात एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण करते हैं। राष्ट्रपति द्वारा एक साथ समवेत संसद के दोनों सदनों में अभिभाषण किए जाने तक तथा संसद को इसके आह्वान के कारणों को बताए जाने तक कोई अन्य कार्य नहीं किया जाता है। |
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लोक सभा
लोक सभा - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं जन प्रतिनिधियों का निकाय है। इसके सदस्यों का प्रत्यक्ष निर्वाचन मताधिकार प्रणाली से 18 वर्ष से अधिक आयु के वयस्क लोगों द्वारा सामान्यतः प्रत्येक 5 वर्षों में एक बार किया जाता है। सदन की सदस्यता के लिए न्यूनतम अर्ह आयु 25 वर्ष है।
संविधान के अनुसार लोक सभा में राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए 530 से अनधिक सदस्य, संघ राज्य क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए 20 से अनधिक सदस्य और यदि राष्ट्रपति की यह राय है कि लोकसभा में आंग्ल भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व पर्याप्त नहीं है तो राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए गए उस समुदाय के दो से अनधिक सदस्य शामिल हैं।
राज्यों के क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्र से प्रत्यक्ष चुनाव द्वारा चुने गए सदस्य संख्या की सीमा बढ़ सकती है, यदि ऐसा संसद के अधिनियम द्वारा राज्यों के पुनर्गठन की वजह से हुआ हो।
लोकसभा का सामान्य कार्यकाल पांच वर्षों का है किन्तु इसे राष्ट्रपति द्वारा पहले भी विघटित किया जा सकता है। संविधान के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल के प्रख्यापन के प्रभावी होने की अवधि के दौरान स्वयं संसद द्वारा पारित अधिनियम द्वारा सामान्य कार्यकाल को बढ़ाया जा सकता है। इस अवधि को एक बार में एक वर्ष से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता और किसी भी प्रकार प्रख्यापन के समापन की अवधि से छह माह से अधिक नहीं बढ़ाया जा सकता है।
लोकसभा के सदस्यों में से एक पीठासीन अधिकारी का चुनाव किया जाता है और उसे अध्यक्ष कहा जाता है। सदन के सदस्य अध्यक्ष की सहायता के लिए एक उपाध्यक्ष का भी चुनाव करते हैं। लोकसभा की कार्यवाही अध्यक्ष की जिम्मेदारी होती है।
- लोकसभा अध्यक्ष का कार्यालय - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- लोकसभा सदस्यों की सूची
- सदन की कार्यवाही की आधिकारिक रिपोर्ट - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- लोक सभा में प्रश्नकाल - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- लोक सभा टीवी वेबकास्ट - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
| राज्य सभा | ||
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राज्यसभा - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं संसद का उच्च सदन है। इसके सदस्य जनता द्वारा प्रत्यक्ष नहीं चुने जाते लेकिन परोक्ष रूप से विभिन्न राज्यों की विधानसभाओं द्वारा चुने जाते हैं। प्रत्येक राज्य के लिए सदस्यों की एक निश्चित संख्या निर्धारित की गई है। राष्ट्रपति द्वारा साहित्य, कला, विज्ञान और सामाजिक सेवाओं के क्षेत्र में गौरव अर्जित करने वाले 12 सदस्यों को मनोनीत किया जाता हैं। राज्यसभा एक स्थायी सदन है। इसे भंग नहीं किया जा सकता लेकिन इसके एक तिहाई सदस्य हर दो वर्ष के बाद अवकाश ग्रहण करते हैं। राज्यसभा 3 अप्रैल 1952 को पहली बार विधिवत गठित की गई और उसी वर्ष 13 मई को इसकी पहली बैठक हुई। भारत के उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। उनका चुनाव निर्वाचन मंडल के सदस्य करते हैं। निर्वाचक मंडल में संसद के दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। इस सदन के सदस्यों में से एक उपसभापति का भी चुनाव होता है। |
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संसद के सदस्य की निरर्हता
संविधान के अनुसार (बावनवां संशोधन) अधिनियम, 1985, संविधान के (इक्यानवेवां संशोधन) अधिनियम, 2003 द्वारा यथा संशोधित, एक नए प्रावधान दल-बदल रोधी कानून के तौर पर जाना जाता है, इसमें दल परिवर्तन के आधार पर संसद सदस्यों की निरर्हता की परिभाषा संविधान द्वारा निगमित की गई है।
संविधान की दसवीं अनुसूची का पैरा 8 (1) दोनों सभाओं के पीठासीन अधिकारियों को इस अनुसूची के उपबंधों को लागू करने के लिए नियम बनाने की शक्तियां प्रदान करता है।
इस नियम के अंतर्गत कोई निर्वाचित संसद सदस्य जो किसी राजनीतिक दल द्वारा खड़े किए गए उम्मीदवार के रूप में निर्वाचित हुआ है, जो अपना स्थान ग्रहण करते समय किसी राजनीतिक दल का सदस्य है, दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हित होगा यदि वह ऐसे राजनीतिक दल से अपनी सदस्यता स्वेच्छा से छोड़ देता है अथवा ऐसे दल के किसी निर्देश के विपरीत सभा में मतदान करता है या मतदान में भाग नहीं लेता है।
संसद या राज्य विधान मंडल का कोई निर्दलीय सदस्य निरर्हित होगा यदि वह अपने निर्वाचन के पश्चात् किसी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है।
संसद या राज्य विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य निरर्हता का पात्र हो गया है या नहीं इस प्रश्न का निर्णय सदन का पीठासीन अधिकारी करेगा; यदि प्रश्न स्वयं पीठासीन अधिकारी से ही संबंधित हो तो उसका निर्णय सभा द्वारा इस निमित्त निर्वाचित सभा के किसी सदस्य द्वारा किया जाएगा।
लोक सभा सदस्य (दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता) (16 KB) - पीडीएफ फाइल जो नई विंडों में खुलती है
नियम, 1985, अध्यक्ष द्वारा दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निर्मित नियमों द्वारा सभा में विधायी दल के नेताओं पर यह जिम्मेदारी छोड़ी गई है कि वे ऐसे विधानमंडल दल के सदस्यों के नामों का एक विवरण अध्यक्ष के सम्मुख प्रस्तुत करें।
विधायी दल के नेता से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह दल की संख्या में अथवा इसके नियमों, विनियमों, संविधान आदि में होने वाले परिवर्तनों के बारे में अध्यक्ष को सूचित करे।
जहां किसी भी राजनीतिक दल का एक सदस्य ऐसे राजनीतिक दल या व्यक्ति अथवा प्राधिकारी द्वारा इस संबंध में दिए गए निर्देश के विरूद्ध प्रत्येक मामले में राजनीतिक दल की पूर्व अनुज्ञा के बिना सभा में मतदान करता है अथवा मतदान के समय सभा से अनुपस्थित रहता है, तो संबंधित विधायी दल का नेता अथवा जैसी भी स्थिति हो से यह अपेक्षा की जाती है कि वह इस मामले में अध्यक्ष को सूचित करे कि क्या ऐसे राजनीतिकि दल, व्यक्ति अथवा प्राधिकारी द्वारा ऐसे मतदान अथवा ऐसी अनुपस्थिति को माफ कर दिया गया है अथवा नहीं।
| संसद के कार्य | ||
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दोनों सदनों का मुख्य कार्य विधान पारित करना है। किसी भी विधेयक के विधान बनने के पूर्व इसे दोनों सदनों द्वारा पारित किया जाना होता है तथा राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त करनी होती है। संसद भारत के संविधान की सातवीं अनुसूची की संघ सूची के अंतर्गत उल्लिखित विषयों पर विधान बना सकता है। मोटे तौर पर संघ के विषय में वैसे महत्वपूर्ण विषय हैं जिनका प्रशासन सुविधा, कार्यकुशलता तथा सुरक्षा कारणों से अखिल-भारतीय आधार पर किया जाता है। विधान पारित करने के अतिरिक्त संसद संकल्प, स्थगन प्रस्ताव, चर्चा तथा सदस्यों द्वारा मंत्रियों को संबोधित प्रश्नों के माध्यम से देश के प्रशासन पर नियंत्रण रख सकती है तथा लोगों की स्वतंत्रताओं की रक्षा कर सकती है। |
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प्रश्नकाल
सभा की कार्यवाही के दौरान एक निश्चित अवधि संसद के सदस्यों को प्रश्न पूछने के लिए दी गई है और सरकार के मंत्रियों को उन सवालों के जवाब देने के लिए बाध्य किया गया है। सामान्यतया, लोकसभा की बैठक का पहला घंटा प्रश्नों के लिए होता है और उसे प्रश्नकाल - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं कहा जाता है।
प्रश्नकाल का संसद की कार्यवाही में एक विशेष महत्व है। प्रश्न पूछना सदस्यों का जन्मजात और उन्मुक्त संसदीय अधिकार व लोकतंत्र की मूलभूत विशेषता है। प्रश्नकाल के दौरान सदस्य प्रशासन और सरकार के कार्यकलापों के प्रत्येक पहलू पर प्रश्न पूछ सकते हैं।
यहां प्रश्न चार प्रकार के होते हैं- तारांकित, अतारांकित, अल्प सूचना प्रश्न और गैर सरकारी सदस्यों को संबोधित प्रश्न जिन्हें प्रशनकाल के दौरान पूछा जाता है। तारांकित प्रश्न वह होता है, जिसका मौखिक उत्तर सदस्य सभा में चाहता है जबकि अतारांकित प्रश्न वह होता है जिसका उत्तर सदस्य लिखित चाहता है। तारांकित प्रश्न के उत्तर के पश्चात सदस्यों द्वारा पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं जिनका उत्तर मंत्री सभा में देता है, अतारांकित प्रश्न के संबंध में पूरक प्रश्न पूछे जाने की अनुमति नहीं होती है। दोनों ही प्रकार के प्रश्न पंद्रह स्पष्ट दिनों की सूचना लिखित में दिए जाने पर पूछे जाते हैं।
इसके अतिरिक्त, सदस्य संसद में अल्प सूचना प्रश्न कम समय में दी गई सूचना पर पूछ सकते हैं। ये प्रश्न मौखिक तौर पर सदन के भीतर प्रश्नकाल के बाद या प्रश्नकाल न होने पर एजेंडे में पहले स्थान पर हो, तारांकित और अतारांकित प्रश्नों के लिए निर्धारित कम से कम समय सूचना पर पूछा जाना चाहिए। यदि अध्यक्ष की राय में प्रश्न अविलंबनीय महत्व का है तो संबंधित मंत्री से यह पूछा जाता है।
कोई प्रश्न किसी गैर-सरकारी सदस्य को भी संबोधित किया जा सकता है परंतु यह तब होता है जब उस प्रश्न की विषय-वस्तु किसी विधेयक, संकल्प अथवा सभा के कार्य से संबंधित किसी अन्य मामले, जिसके लिए वह सदस्य उत्तरदायी है, से संबंध रखती है। ऐसे प्रश्नों के मामले में प्रक्रिया वही है जो किसी मंत्री को ऐसे परिवर्तनों के साथ, जैसा कि अध्यक्ष आवश्यक समझे, संबोधित प्रश्नों के मामले में अपनायी जाती है।
- लोकसभा: सवालों की सूची - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- राज्यसभा: खोज प्रश्न - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- प्रक्रिया के नियम - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
| संसदीय वाद-विवाद | ||
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संसद की कार्यवाही का आधिकारिक वृत्तांत अर्थात् वाद-विवाद प्रक्रिया तथा कार्य संचालय नियम के नियम 379 और नियम 382 के अनुसार लोक सभा की प्रत्येक बैठक पूरा वृत्तांत तैयार कर कार्यवाही के अंत में वितरित किया जाता है। लोक सभा सचिवालय द्वारा अध्यक्ष के प्राधिकार के अंतर्गत उसके दिशा-निर्देश के मुताबिक वाद-विवाद वृत्तांत तैयार किया जाता है। |
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संसदीय समिति
संसदीय समितियाँ संसदीय प्रणाली में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ये संसद, कार्यपालिका और आम जनता के बीच की मजबूत कड़ी होती हैं। इन दिनों विधायिका के पास अत्यधिक कार्य होता है और उसके पास उन्हें निपटाने के लिए सीमित समय होता है, इसलिए सभा के कतिपय कार्यों को समितियों को सौंपा जाना एक सामान्य परिपाटी बन गई है।
यह इस बात से और भी आवश्यक हो गया है कि समिति के पास उसे भेजे गए किसी मामले के संबंध में विशेषज्ञता होती है। किसी समिति में मामले पर अपेक्षाकृत शांत माहौल में विस्तार और गहराई से सोच-विचार किया जाता है, मुक्त रूप से विचार व्यक्त किए जाते हैं।
समितियाँ विधायिका को उसके दायित्वों के निर्वहन करने और उसके कार्यों को कारगर ढंग से, शीघ्रता से और कुशलता से विनियमित करने में सहायता करती हैं। समितियों के माध्यम से संसद, प्रशासन पर अपने नियंत्रण और प्रभाव का प्रयोग करती है। संसदीय समितियाँ, कार्यपालिका पर हितकारी प्रभाव डालती हैं।
संसदीय समिति, सभा द्वारा नियुक्त या निर्वाचित की जाती है अथवा अध्यक्ष द्वारा नाम-निर्देशित की जाती है और अध्यक्ष के निदेशानुसार कार्य करती है तथा अपना प्रतिवेदन सभा को या अध्यक्ष को प्रस्तुत करती है और समिति का सचिवालय लोक सभा सचिवालय द्वारा उपलब्ध कराया जाता है।
- लोकसभा में संसदीय समितियाँ - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- राज्य सभा में संसदीय समितियाँ - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
संबंधित वेबसाइट
- इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रकाशन - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- संसद में आने वाले दर्शकों के लिए मार्ग-निर्देशिका - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- राष्ट्रमंडल संसदीय संघ (सीपीए) - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- मंत्रियों की परिषद - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- संसदीय ग्रंथालय - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं
- संसदीय संग्रहालय - बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं




