विज्ञान और प्रौद्योगिकी
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तटीय व समुद्री पारिस्थितिकी

समुद्री सजीव संसाधन: देश के आस-पास समुद्रों में जीवित संसाधनों के व्‍यवस्थित वैज्ञानिक आकलन के लिए मत्‍स्‍य अनुसंधान व अन्‍य संस्‍थानों ने मिल कर एक समर्पित का र्य क्रम शुरू किया है। इसका समन्‍वय समुद्री सजीव संसाधन एवं पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र (सीएमएलआरई) कोच्चि कर रहा है। समुद्री जीवों से औषधि विकास के लिए पिछले कुछ दशकों में कई प्रयास किए कए। दो योगिकों (मधुमेह निरोधी और डिस लिपिडेमिया निरोधी) को निकाला गया है और उन्‍हें औषधि रूप में लाने का कार्य काफी आगे बढ़ चुका है। इसके अलावा सीसे वाले यौगि‍क एंटीबायोटिक, एंटीवायरल रक्‍त कैंसर विरोधी पाए गए हैं और उनकी विषाक्‍तता व प्रायोगिक परीक्षण का कार्य चल रहा है। मंत्रालय में समुद्री विज्ञान को लोगों तक पहुंचाने के लिए समुद्र जागरुकता कार्यक्रम चल रहा है।

झींगा मोटपन तकनीक: राष्‍ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्‍थान, चेन्‍नई ने झींगा मछली व केकड़ों को मोटा करने की तकनीक विकसित की है। तमिलनाडु में मन्‍नार की खाड़ी और अंडमान द्वीपों के चुनिंदा लाभार्थियों के लिए प्रयोग के तौर पर यह तकनीक उपयोग की गई। इससे मछलीमारों की आमदनी में उल्‍लेखनीय उल्‍लेखनीय वृद्धि हुई। समुद्री खरपतवार कल्‍चर की यह तकनीक मन्‍नार की 100 महिलाओं को, झींगा को मोटा बनाने और केकड़ों को मोटा बनाने की तकनीक अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह की 25-25 महिलाओं को उपलब्‍ध कराई जाएंगी। इसके अलावा एनआईओटी ने लक्षद्वीप के  लाभार्थियों के लिए अरब सागर में 28 मत्‍स्‍य विकास उपकरण लगाए हैं।

समेकित तटीय व समुद्री क्षेत्र प्रबंधन (आईसीएमएएम)

1998 में शुरू हुए इस कार्यक्रम का उद्देश्‍य तटीय इलाकों की समस्‍याओं जैसे मिट्टी का अपरदन, प्रदूषण और अधिवास का नष्‍ट होना आदि से निबटने के लिए वैज्ञानिक उपाय और तकनीकों को उपयोग करना है। इससे मैंग्रोव, मुंगा पर्वतों, तथा अन्‍य जीव विज्ञान के महत्‍वपूर्ण क्षेत्रों की सेहत का आकलन दूरसंवेदी यंत्रों से किया जा सकता है। गणितीय मॉडलों से तटों के अपरदन का आकलन और वैकल्पिक उपायों का प्रदर्शन एन्‍नोर (तमिलनाडु), पनथुरा और कायनकुलम (केरल) तथा मैंगलोर (कर्नाटक ) में किया गया। इसी तरह की परियोजनाएं गोपालपुर (उ ड़ी सा), कर्नाटक के उत्‍तरी कनारा और अन्‍य चुनिंदा समुद्र तटों पर भी यह परियोजना चलाई जा रही है। कोच्चि के बैकवाटर्स, चिलका झील और सुंदर व न में पारिस्थितिकी मॉडल की पहल भी की गई है। प्रदूषण नियंत्रण प्रयास के रूप में एन्‍नोर, तापी (गुजरात), और हुगली (प. बंगाल) में सीवेज की अपशिष्‍ट सम्मिश्रण क्षमता के मापन की गणितीय मॉडल तकनीक इस्‍तेमाल की गई। इसके अलावा पारा, तांबा, कैडमियम तथा अन्‍य के विषाक्‍तता प्रयोग भी किए गए।

तटीय समुद्र निगरानी एवं अनुमान प्रणाली

समुद्री पर्यावरण की सेहत का लंबे समय के लिए अनुमान लगाने के लिए यह कार्यक्रम 1990 से लागू है। इसमें समुद्र में मिलने वाले औद्योगिक व घरेलू अस्‍वच्‍छ अपशिष्‍ट जल में रसायनों की मात्रा का आकलन 76 तटीय इलाकों में किया जा रहा है। पाया गया है कि मुंबई के अलावा सभी स्‍थानों पर समुद्र तट के 2 कि.मी. बाद का पानी स्‍वच्‍छ है। मुंबई में तट से 5 कि.मी. के बाद पानी स्‍वच्‍छ है। मुंबई का समुद्रतट, बेरावाल बंदरगाह, केरल में वेली का तटीय जल बुरी तरह प्रदूषित है। हजीरा, कोच्चि, कुड्डालोर, तूतीकोरिन, एन्‍नोर, विशाखापट्नम, पुरी और सैंडहेड्स (प.बंगाल) में भी समुद्री जल प्रदूषित है लेकिन समुद्री पानी में डीडीटी और कार्बन हैक्‍साक्‍लोराइड जैसे कीटनाशक नहीं हैं।

समुद्री अनुसंधान नौकाएं

समुद्र में वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए अनुसंधान नौकाओं की जरूरत को देखते हुए विभाग ने अत्‍याधुनिक अनुसंधान नौकाएं-ओआरवी सागर कन्‍या और एफओआरवी सागर संपदा क्रमश: 1983 और 1984 में खरीदी है। अब तक ये नौकाएं क्रमश: 230 और 247 से ज्‍यादा समुद्र यात्राएं कर चुकी हैं जिनमें अंटार्कटिक क्रिल संसाधनों सहित अन्‍य सजीव और निर्जीव समुद्री संसाधनों की खोज और दोहन का कार्य किया गया। 1998 तटीय अनुसंधान नौकाएं सागर पूर्वी व सागर पश्चिमी तथा सागर मंजूषा खरीदी गईं ताकि समुद्री अवलोकन के कार्य में मदद मिले। तकनीकी विकास के लिए सागर निधि नौका का निर्माण किया गया।

अजीवित संसाधनों के लगातार दोहन के लिए तकनीकी प्रदर्शन नौका जैसे मंच जरूरी होते हैं।  2005 में बहुउद्देश्यी पोत की प्रौद्योगिकी के लिए नया कार्यक्रम आरंभ किया गया। कई विशेषताओं के साथ एक नई प्रौद्योगिकी प्रदर्शन पोत के विस्तृत डिजाइन को 2006 के अंत तक पूरा कर लिया गया। रिकॉर्ड समय में सागर निधि पोत का निर्माण पूरा कर लिया गया और जून 2007 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री ने इसका शुभारंभ किया। 10 दिसंबर 2007 से इसकी सेवाएं आरंभ हो गई। यह उथले समुद्र में भी सर्वेक्षण का कार्य कर सकती है। ग्‍यारहवीं योजना के तहत वैज्ञानिक कार्यक्रमों के लिए इसका इस्‍तेमाल किया जाएगा। इस कार्यक्रम का समन्‍वय एनआईओटी करेगा। इस नौका को तीन मार्च 2008 को केंद्रीय पृथ्‍वी विज्ञान मंत्री ने राष्‍ट्र को समर्पित किया। यह नौका 30 वैज्ञानिकों को लेकर 45 दिन तक लगातार चलने और विविध क्षेत्रों में अनुसंधान कार्य संचालित करने में सक्षम है। यह 5050 टन की आईसीई श्रेणी की नौका है जिसमें आरओवी, एयूवी तथा मानव चालित पनडुब्‍बी भी है।

जलवायु परिवर्तन अध्‍ययन

मंत्रालय ने जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले स्‍वास्‍थ्‍य, कृषि, पानी आदि पर प्रभाव से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं पर विचार करने के लिए पुणे में एक विशिष्‍ट केंद्र शुरू किया है।

उष्‍ण‍कटिबंधीय मौसम और मानसून जलवायु के अनुमान में आधारभूत अध्‍ययन के अपने लक्ष्‍य के अनुसार भारतीय उष्‍णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्‍थान (आईआईटीएम) ने मौसम पूर्वानुमान, मानसून परिवर्तन, जलवायु परिवर्तन, वातावरणीय रसायन मॉडलिंग और वायु गुणवत्ता मापन के क्षेत्र में पिछले तीन वर्षो में महत्‍वपूर्ण योगदान किया है। संस्‍थान के कुछ महत्‍वपूर्ण योगदान हैं-

संस्‍थान ने उपलब्‍ध कराया और इसका वैश्विक उष्‍णता से संबंध स्‍पष्‍ट किया।

  1. आईआईटीएम की लंबे समय की मौसम औसत वर्षा भविष्‍यवाणी के लिए इंपीरिकल मॉडल्‍स के विकास में महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है।
  2. देश में पहली बार विभिन्‍न जलवायु परिवर्तन परिदृष्‍यों में भारतीय ग्रीष्‍मकालीन मानसून का अनुमान किया गया। इसके लिए हेडली सेंटर क्षेत्रीय जलवायु मॉडल के नवीनतम मॉडल का उपयोग किया गया। विभिन्‍न प्रभाव अनुमान समूहों को डाटा उत्‍पादों का वितरण भी किया गया।
  3. 1951-2000 के बीच मानसून के मौसम में मध्‍य भारत में हल्‍की से मध्‍यम वर्षा की आवृति में कमी और भारी वर्षा की तीव्रता और आवृति में वृद्धि का पहला प्रमाण संस्‍थान ने उपलब्‍ध कराया और इसका वैश्विक उष्‍णता से संबंध स्‍पष्‍ट किया।
  4. उष्‍णकटिबंधीय हिंदमहासागर में वायु चक्रीय गति और दक्षिण पश्चिम मानसूनी हवाओं के बीच फीडबैक को दो मौसमों के बीच के टाइम स्‍‍केल में विकसित किया है जो कि भारत में मानसूनी वर्षा के लंबे अंतरालों और सूखे की स्थिति का पूर्वानुमान करने के लिए महत्‍वपूर्ण है।
  5. लीडार समूह के वैज्ञानिकों ने यहां एक्‍सीमर लेसर आधारित डीआईएल टैक्‍नीक फॉर वर्टिकल प्रोफाइलिंग ऑफ ओजोन अपटु स्‍ट्रेटोस्‍फीरिक एल्‍टीट्यूड्स विकसित किया है। जिससे पुणे में देश में पहली बार ओजोन के उर्ध्‍वाधर प्रोफाइल का मापन किया गया।
  6. क्‍या कारण है कि सभी एल-नीनो मानसूनी सूखे से संबंधित नहीं है, इस सवाल पर भी एक नई दृष्टि मिली।

स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 09-02-2011