कृषि जैव प्रौद्योगिकी-फसलें
चावल की फसल के लिए क्यूटीएल में एलेलीज की पहचान, मानचित्रण और स्थानांतरण, बीसी2एफ4 के कृषि वैज्ञानिक मूल्यांकन, नियर आइसोजोनिक इंट्रोग्रेशन लाइन्स (एनआईआईएल) की परियोजना में इस वर्ष लगातार दूसरे साल 200 बीसी2एफ5 संततियों का मूल्यांकन किया गया। हिमालयन राई और देसी गेहूं के जीनोटाइप्स को मिलाकर एक नई ट्रिटिकल लाइन विकसित की गई है जिसे बहुत खास राई-गेहूं ट्रांसलोकेशन प्राप्त करने के विविध स्रोतों के रूप में उपयोग किया जाएगा। चावल की क्रियात्मक जीनोमिक्स परियोजना का उद्देश्य जीनों की खोज और कार्यिक पुष्टिकरण था। जंगली प्रजातियों जैसे
- लॉन्गीस्टैमिनेटा,
- निवारा,
- ग्लैबेरिमा और
भू-प्रजाति एसी 32753 और आईआर 64 की कुछ उत्परिवर्तित पंक्तियों की प्राप्ति के दौरान बैक्टीरियल ब्लाइट प्रतिरोधक जीन की खोज हुई है।
गॉलमिज प्रतिरोधक जीन जीएम 1 और जीएम 4 का बारीकी से 2एमबी क्षेत्र के 10 सीएम के भीतर ही मानचित्रण किया जा रहा है। चावल में क्षारीयता और निर्जलीकरण सहनशक्ति बढ़ाने के लिए चल रहे एक कार्यक्रम में 1,6, बिसफॉस्फेट फ्रक्टोज के जीन कूट का पूरा क्लोन बना लिया गया। और पाया गया कि यह एन्जाइम नमक की मौजूदगी में सक्रिय होता है। जीन परिवर्तन के बाद बनाई गई सरसों (डीएमएच-11) के कई जगहों पर मूल्यांकन की बारनेस आधारित बारनेस-बारस्टार प्रणाली पर आधारित परियोजना में राष्ट्रीय अरंडी-सरसों अनुसंधान केंद्र भरतपुर ने परीक्षण किए। इनमें चार चीजों- सीएमएस आधारित संकट (डीएमएच-11), राष्ट्रीय चेक्स (वरूण और क्रांति) और 10 स्थानों पर क्षेत्रीय जांच भी की गई।
यह देखा गया कि 9 में से 6 स्थानों पर डीएमएच-11 प्रजाति की पैदावार ज्यादा रही। कीटप्रतिरोधक जीन परिवर्तित कपास के विकास की परियोजना में सीआरवाई1 एसी जीनयुक्त कपास (कोकर 310 एफआर) में करीब 300 स्वतंत्र ट्रांसजेनिक्स पंक्तियां विकसित की गई जिसमें हेलिकोवेरपा आर्मिगेरा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता थी। ज्यादातर जीनपरिवर्तित प्रजातियों में सीआरवाई 1 एसी जीन डबल एनहान्सर सीएएम वी35एस प्रमोटर के नियंत्रण में रहता है। कपास के उत्परिवर्तन की प्रविधि में भी तरक्की हुई है जिसमें मार्कर के रूप में डबल म्यूटेंट एसीटोलेक्टेट सिंथेज जीन के इस्तेमाल से कैनामाइसिन की जगह इमिडाजोलिलोन को चुनाव कारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
जैव उर्वरक
पर्यावरण के प्रति चिंता बढ़ने के साथ ही रासायनिक खाद पर आधारित खेती की जगह कार्बनिक और अकार्बनिकों का स्रोतों मिला-जुलाकर इस्तेमाल किया जा रहा है। इस संदर्भ में जैव उर्वरक उत्पादकता बढा़ने के सस्ते, दोबारा इस्तेमाल योग्य और सुरक्षित स्रोत माने गए हैं। साथ ही जैविक/कार्बनिक खेती के बढ़ते चलन के कारण जैव उर्वरकों की मांग काफी ज्यादा होन की उम्मीद है। यहां यह समझना होगा कि सूक्ष्मजीव पोषकतत्व परिस्थितिकीय निवेश हैं जिनका प्रभाव रासायनिक खाद की तरह चमत्कारी न होकर धीमा होता है।
अजैविक कारकों को ध्यान में रखते हुए भंडारण और आवागमन के समय फसल को ज्यादा समय तक संभालकर रखने पर भी ध्यान देने की जरूरत है। गुणवत्ता आधारित उत्पादन और विपणन नेटवर्क में ग्राहक की संतुष्टि के लिए जैव उर्वरक निश्चय ही उपयोगी साबित होंगे। इन बातों को ध्यान में रखते हुए द्रव जैव उर्वरक और बागानी फसलों और औषधीय पौधों के लिए जैव उर्वरक आधारित समेकित पोषण प्रबंधन पैकेज बनाने के लिए कार्यक्रम बनाए गए हैं। साथ ही ट्रांसजेनोसिस के जरिए विकसित जैव उर्वरकों का नियंत्रित परिस्थितियों में मूल्यांकन किया जाएगा।
जैव खरपतवार नाशक तथा उपज प्रबंधक
यह कार्यक्रम कीटों, रोगों और खरपतवार के प्रबंधन के साथ व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य प्रचुर उत्पादन प्रौद्योगिकियों के विकास हेतु चलाया जाता है। कीट व खरपतवार नष्ट करने के प्रभावकारी और सस्ते जैविक तरीके विकसित कर लिए गए हैं। विभिन्न फसलों को कवक और विषाणु के प्रकोप से बचाने के लिए कई फार्मूले बना कर उनका परीक्षण भी कर लिया गया है। एन्टोमोपैथोजेनिक निमेटोड्स की विभिन्न प्रजातियों में तापमान आदि पर्यावरणीय कारकों के प्रति सहनशक्ति बढ़ाने के लिए जेनेटिक सुधार किए गए। अरहर के कीट, चावल के तना वेधक, चना फली बेधक, इलायची की जड़ सूंडी, कपास के शोषक कीट के खिलाफ भी ये प्रभावी पाए गए। दो परभक्षियों डिफा अफीदीवोरा और माइक्रोउन्स इगोरोटस के संरक्षण और आबादी बढ़ाने में सफलता मिली है, जो गन्ने के रोएंदार माहू की संख्या पर नियंत्रण रखते हैं। फेरोमोन्स डोडाकीट की विभिन्न प्रजातियों जैसे अनार के फल बेधकों और नारंगी के चूषक कीटों के खिलाफ प्रभावी साबित हुए हैं। फेरोमोन छिड़काव यंत्र भी विकसित किए गए हैं जो भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल हैं। विभिन्न पौध प्रजातियों के कीटनाशक जहरीले जीन और जीवाणु जीन बनाए जा रहे हैं ताकि प्रभावी जैव-कीटनाशक विकसित किया जा सके। पार्थेनियम के प्रबंधन पर एक बहुकेंद्रीक कार्यक्रम इस खरपतवार को नियंत्रित करने के लिए शुरू किया गया था। यह कार्यक्रम सुचारू रूप से चल रहा है। विभाग की पहल पर जैव कीट व खरपतवार नाशकों के पंजीकरण के दिशा निर्देश सरल बना दिए गए हैं। जैव खरपतवार नाशकों के व्यावसायीकरण बढ़ावा देने के लिए 10 जैव खरपतवारनाशकों के प्राथमिक संवर्धनों और उनके फार्मूलेशन दोनों के विषवैज्ञानिक आंकड़े इकट्ठे किए जा रहे हैं। जैव कीट व खरपतवार नाशकों पर एक व्यापक वेबसाइट बनाई गई है जो विभाग द्वारा इन क्षेत्रों में चलाए जा रहे महत्वपूर्ण कार्यक्रमों की उपलब्धियों को प्रकाशित करती है।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 09-02-2011

