अंटार्कटिक अभियान और ध्रुवीय विज्ञान
वर्ष 1981 में प्रारंभ हुआ अंटार्कटिक अभियान अब विशेष बहु संस्थागत और बहु विषयी रूचि वाले मुख्य राष्ट्रीय कार्यक्रम में बदल गया है। अभी तक 25 वैज्ञानिक अभियानों को लगातार भेजा जा चुका है। इसके अतिरिक्त ध्रुवीय विज्ञान के प्रमुख क्षेत्रों में अनुसंधान हेतु दक्षिणी महासागरों में तीन अभियान भेजे गए जिसमें एक वेडल समुद्री अभियान तथा अंटार्कटिक जल में क्रील संसाधनों के आकलन हेतु क्रिल अभियान भी शामिल है। पूर्व अंटार्कटिक के सेंट्रल ड्रोनिंग मॉड लैंड में स्थित भारतीय केंद्र मैत्री ने ध्रुवीय अभियान के सभी प्रमुख विषयों में अध्ययन हेतु एक ऐसा मंच उपलब्ध कराया है जिसका लाभ 75 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं, संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सर्वेक्षण एवं सेवा संगठनों के 1500 से अधिक लोग उठा चुके हैं। राष्ट्रीय सुविधाओं और विशेषज्ञों की नेटवर्किंग का यह एक उत्कृष्टतम उदाहरण है। इस मंत्रालय के अधीन गोवा में स्थापित एक स्वायत्तशासी निकाय राष्ट्रीय अंटार्कटिक एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) (एनसीएओआर) द्वारा प्रतिवर्ष अंटार्कटिक हेतु अभियान भेजे जाते हैं तथा यह संस्थान देश में ऐसा पहला अपनी तरह का स्थान है जो ध्रुवीय अनुसंधान के सभी पहलुओं के प्रति पूर्णतः समर्पित है।
एनसीएओआर पूरी तरह से ध्रुवीय अनुसंधान के सभी पहलुओं को समर्पित देश में अपनी तरह का पहला संस्थान है। अंटार्कटिक में किए जाने वाले वैज्ञानिक प्रयोग ग्रीनहाउस गैसों की माप, दूर-भूकंपीय अध्ययनों, मैत्री में स्थायी जीपीएस ट्रैकिंग केंद्र, बर्फ की परतों पर दरारों के फैलाव का अध्ययन तथा मैत्री में संचार से संबंधित है। ओआरवी सागर कन्या ने भी दक्षिणी महासागर में कई प्रयोग किए।
25वें भारतीय अंटार्कटिक अभियान जिसने दिसंबर 2005 में केपटाउन से अपनी आगे की यात्रा प्रारंभ की थी, में दो छात्रों तथा एक निजी अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिक को पहली बार शामिल किया गया था। इसी वर्ष जून 2006 में स्टॉकहोम में हुई अंटार्कटिक संधि प्रशासनिक निकाय की 28वीं अंटार्कटिक संधि सलाहकार बैठक (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) (एटीसीएम) में दक्षिण गंगोत्री हिमनद को अंटार्कटिक विशेष संरक्षित क्षेत्र (एएसपीए) घोषित किया गया। भारतीय वैज्ञानिक इस हिमनद की पिछले 23 वर्षों से निगरानी कर रहे हैं। अंटार्कटिक से लाए गए बर्फ के टुकड़ों के अध्ययन हेतु एनसीएओआर गोवा में एक आईस कोर प्रयोगशाला अब पूरी तरह से क्रियाशील हो गई है।
महासागर प्रेक्षण और सूचना सेवाएं (ओओआईएस )
ऐसा माना जा रहा है कि जलवायु परिवर्तन मौसम प्रणाली में आए बदलाव का एक महत्वपूर्ण कारक है जिससे विश्व के अनेक भागों में बाढ़, सूखा और अत्यधिक गर्मी पड़ी। जलवायु के बदलाव को जानना भारत के लिए जरूरी है क्योंकि यहां मानसून अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हालांकि जलवायु परिवर्तन में महासागरों की भूमिका महत्वपूर्ण है किंतु इसे पूर्णरूप से विशेषतः ऊष्मा और द्रव्यमान के विनिमय के संदर्भ में समझा नहीं जा सका है। समुद्रों के बारे में सूचना और जानकारी के महत्व को समझते हुए राष्ट्रीय प्रेक्षक और सूचना सेवाओं का महत्वपूर्ण कार्यक्रम चलाया गया है। इसके उद्देश्य हैं,
- अनेक प्रकार के महासागर-मौसम और तटीय मॉडलों का विकास
- उपग्रह मानदंडों की पुनः प्राप्ति हेतु एलगोरिथम्स (गणितीय) सूत्र तैयार करना
- महासागर निगरानी का विस्तार, जिसमें स्थानिक तथा उपग्रह माप शामिल हैं तथा
- महासागर परामर्श सेवाओं को चालू करना
इन सेवाओं के चार महत्वपूर्ण अंग हैं, महासागर प्रेक्षण प्रणाली, महासागर सूचना सेवाएं, महासागर माडलिंग तथा गतिकी (आईएनडीओएमओडी) और उपग्रह तटीय महासागर विज्ञान अनुसंधान (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) (एसएटीसीओआरई)।
महासागर प्रेक्षण प्रणालियां (ओओएस)
अंतर-सरकारी महासागर विज्ञान आयोग की वैश्विक महासागर प्रेक्षण प्रणाली को डब्ल्यूएमओ, यूनएनईपी और आईसीएसयू का समर्थन प्राप्त है। अंतरराष्ट्रीय स्तर की यह व्यवस्थित प्रणाली समुद्री और महासागर विज्ञान के ऐसे आंकड़ों और संबंधित उत्पादों को एकत्र करके उनका समन्वयन, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण करती है जिनका विश्वभर में महत्व है और जिन्हें ज्यादा से ज्यादा प्रयोक्ता समूह इस्तेमाल करते हैं। यह माना जाता है कि प्रणाली को अमल में लाने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्षेत्रीय गठबंधन तैयार करना है ताकि समान राष्ट्रीय और क्षेत्रीय हितों के मुद्दे पर ध्यान दिया जा सके। राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) (एनआईओटी) द्वारा चलाए जा रहे राष्ट्रीय डेटा ब्वाय कार्यक्रम (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट) (एनडीबीपी) के अंतर्गत भारतीय समुद्रों, उथले और गहरे दोनों ही में 30 लंगर डाले गए ताकि भारतीय मौसम विभाग, तटरक्षकों की वास्तविक समय के आधार पर जरूरतों को पूरा कर सके और अनेक प्रकार के उपयोगों जैसे बंदरगाह गतिविधियों, जहाज पत्तन, समुद्र के भीतर निर्माण विकास, उपग्रहीय आंकड़ों की पुष्टि, पर्यावरण निगरानी, जलवायु अध्ययन आदि के लिए आंकड़े प्रदान कर सके।
अतिरिक्त ब्वायों की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब देश में ही डेटा ब्वॉय तैयार किए जा रहे हैं। साथ ही भारत हिंद महासागर की अंतरराष्ट्रीय आर्गो (एआरजीओ) परियोजना का समन्वय भी कर रहा है, जिससे 2000 मीटर की गहराई तक के ऊपरी महासागर के तापमान और लवणता के नियमित विवरण मिलते रहेंगे। इससे ऊपरी महासागर की संरचना और गति विज्ञान को समझने में मदद मिलेगी जिनका जलवायु पर असर पड़ता है। भारत ने इस क्षेत्र में नेतृत्व संभाल लिया है और पूरे हिंद महासागर में आर्गो की तैनाती के लिए यह जिम्मेदार है। एक क्षेत्रीय आर्गो डेटा सेंटर – आईएनसीओआईएस हैदराबाद में भी गठित किया गया है, जहां से आर्गो आंकड़ों के विवरण के अलावा छह आर्गो आंकड़ों उत्पादों का एक सेट आईएनसीओआईएस वेबसाइट के माध्यम से उपलब्ध कराया गया।
भारत ने क्षेत्रीय गठबंधन विश्व महासागर प्रेषण प्रणाली का हिंद महासागर हिस्सा (आईओजीओओएस) की स्थापना में अहम भूमिका अदा की है और हिंद महासागर के क्षेत्र में नेतृत्व हासिल किया है। हिंद महासागर की महासागरीय प्रक्रियाओं को समझने और इस क्षेत्र के लोगों के फायदे के लिए इनके उपयोग की दिशा में यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस प्रणाली का उद्देश्य हिंद महासागर को विश्व के सर्वाधिक अध्ययन किए गए महासागरों में शामिल करना है। अभी तक इस महासागर पर सबसे कम अध्ययन हुए हैं लेकिन आईओजीओओएस का इरादा हिंद महासागर को विश्व के अत्यधिक अध्ययन किए गए महासागरों की जमात में शामिल करने का है। इस अध्ययन में सामाजिक तथा वैज्ञानिक मुद्दों के परस्पर संबंधों पर सही मायनों में जोर दिया जाएगा। भारत अंतर सरकारी महासागर विज्ञान आयोग का उपाध्यक्ष है। भारत आईओजीओओएस का चयनित अध्यक्ष है जिसमें इस समय 13 देशों के 24 सदस्य/सहयोगी सदस्य हैं। इसका सचिवालय आईएनसीओआईएस, हैदराबाद में स्थापित किया गया है। दसवीं योजनावधि के दौरान 150 फ्लोट्स लगाने की योजना है जिसमें से भारत ने 107 आर्गो फ्लोट्स लगा लिए हैं।
महासागर सूचना सेवाएं (ओआईएस )
इस कार्यक्रम के तहत समुद्र सतह तापमान (एसएसटी) तथा संभावित मत्स्य क्षेत्र (पीएफजेड) परामर्श, अपवैलिंग क्षेत्रों, मानचित्रों, भंवरों, क्लोरोफिल, निलंबित अवसाद भार आदि के बारे में लगभग वास्तविक समय आंकड़ें तथा आंकड़ा उत्पाद और केंद्र सरकार, राज्यों निगमित क्षेत्र उद्योगों को एक ही स्थान पर परामर्श उपलब्ध कराया जाता है। महासागर विकास, अंतरिक्ष और मत्स्य विज्ञान के वैज्ञानिकों के पिछले पांच सालों के निरंतर प्रयासों के फलस्वरूप विश्वसनीय और उपयोगी सेवा उपलब्ध हो पाई है जिससे पूरे देश के तटीय इलाकों के मछुआरों को उपग्रह आंकड़ों पर आधारित परामर्श मिल पाता है। विभिन्न राज्यों के 225 से ज्यादा नोड्स से संभावित मत्स्य उत्पादन क्षेत्रों के लिए परामर्श सप्ताह में तीन बार जारी किए जाते हैं। ये नोड्स गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गोवा, केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, लक्षद्वीप के अलावा अंडमान और निकोबार द्वीप समूहों में स्थित हैं। मछलीमार गोदियों में वैज्ञानिकों तथा मछुआरों के बीच समय-समय पर और गहन चर्चाएं आयोजित की जाती हैं, इसके साथ ही फैक्स, टेलीफोन, इलेक्ट्रॉनिक डिसप्ले बोर्ड, उपग्रह रेडियो तथा इंटरनेट जैसे माध्यमों के उपयोग ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि स्थानीय भाषाओं में दिए जाने वाले ये परामर्श मछुआरा समुदाय के लिए महत्वपूर्ण कड़ी बन जाएं। विभिन्न प्रकार के अनुप्रयोगों के प्रसार के लिए आईएनसीओआईएस में एक डाइनैमिक वेबसाइट (www.incois.gov.in (बाहरी विंडो में खुलने वाली वेबसाइट)) भी शुरू की गई है। इसके अतिरिक्त आईएनसीओआईएस विभिन्न दावेदारों के लिए प्रायोगिक आधार पर एक महासागर अवस्था भविष्यवाणी भी उपलब्ध करा रहा है।
इस समय आईएनसीओआईएस वेबसाइट के जरिए-लहरों (वेव्स), स्वेल (ज्वार) तथा टाइडल (भाटा) करेंट के तीन पैरामीटर उपलब्ध हैं। साथ ही विभिन्न समाचार पत्रों, पत्रिकाओं, रेडियो और टीवी जैसे माध्यमों के द्वारा 20 समुद्र तटीय क्षेत्रों में लगाए गए इलेक्ट्रॉनिक डिसप्ले बोर्डों से पीएफजे संबंधी सूचनाएं दी जा रही हैं।
स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 09-02-2011

