कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग
कृषि मंत्रालय के अंतर्गत कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग कृषि, पशुपालन तथा मत्स्य-पालन के क्षेत्र में अनुसंधान और शैक्षिक गतिविधियां संचालित करने के लिए उत्तरदायी है। इसके अलावा यह इन क्षेत्रों तथा इनसे संबंधित क्षेत्रों में काम कर रही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों के विभिन्न विभागों और संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ाने में भी मदद करता है। यह विभाग भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् को सरकारी सहयोग, सेवा और संपर्क-सूत्र उपलब्ध कराता है।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् राष्ट्रीय स्तर की शीर्ष स्वायत्त संस्था है, जिसका उद्देश्य कृषि अनुसंधान के क्षेत्र में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी कार्यक्रमों को प्रोत्साहित करना और उनके बारे में शिक्षित करना है। परिषद् प्रत्यक्ष तौर पर कृषि क्षेत्र में संसाधनों के संरक्षण और प्रबंधन, फसलों, पशुओं व मछली आदि पालन से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए पारंपरिक व सीमांत क्षेत्रों में अनुसंधान की गतिविधियों में शामिल है। कृषि क्षेत्र में नई प्रौद्योगिकी विकसित करने में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उसे प्रभारित और लागू करने का कार्य कृषि विज्ञान केंद्रों के व्यापक नेटवर्क से किया जाता है।
कृषि अनुसंधान
परिषद् का मुख्यालय नई दिल्ली में है और देश भर में इसके 49 संस्थान और विश्वविद्यालय स्तर के 4 राष्ट्रीय संस्थान, 6 राष्ट्रीय ब्यूरो, 17 राष्ट्रीय अनुसंधान केंद्र, 25 परियोजना निदेशालय और 61 अखिल भारतीय समन्वय अनुसंधान परियोजनाएं, 17 नेटवर्क परियोजनाएं हैं। कृषि और इससे संबंधित क्षेत्रों में उच्च शिक्षा के लिए 45 राज्य कृषि विश्वविद्यालय और इम्फाल में एक केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय है जो इसके चार विश्वविद्यालयों से अलग है।
आईसीएआर की अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार गतिविधियां
विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान, शिक्षा और विस्तार के कार्यक्रम 2008-09 में इस प्रकार रहे:-
फसल विज्ञान
वर्ष के दौरान 33 अभियानों में 784 जंगली प्रजातियों सहित 2203 का संग्रह किया गया। विकसित पौधों के राष्ट्रीय हर्बोनियम के 371 नमूने, 121 बीज के नमूने और 21 आर्थिक उत्पाद शामिल किए गए। विविध फसलों के 25,456 किस्में विभिन्न देशों से लाए गए और आईसीआरआईएएएडी जर्म प्लाज्म सहित 15000 किस्में 19 देशों को निर्यात किए गए। बीज 13,850 प्रजातियां नेशनल जीव बैंक में शामिल की गई।
गेहूं की पांच, जौ की तीन और ट्रिटिकेल की एक किस्म जारी की जा चुकी है। गेहूं की सोलह जननिक स्टाक पंजीकृत किए गए। मक्का के नौ संकर/समिश्र सेंट्रल वेरायटी रिलीज कमेटी द्वारा देश के विभन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों के लिए जारी किए गए।
सोर्घुम की दो किस्में यथा खरीफ किस्म सीएसवी 23 और रबी की किस्म एसपीवी 1626, बाजरे की दो किस्में जारी की गई। अल्पकालिक सीजन के बीच में बुआई के लिए बाजरे की किस्म जीपीयू 48 कर्नाटक के लिए जारी की गई।
पिजनपी किस्में आजाद (एनईपीजेड), जेकेएम 189 (सीजेड), एलआरजी 30 और एलआरजी 38 (एएजेड) को देर से बुआई के उपयुक्त पाया गया। अधिक उपज देनेवाली दो किस्में मसूर, अंगूरी (आईपीएल 406) और राजमा, अरुण (आईपीआर 98-3-1) को उत्तरी राज्यों, गुजरात, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ के लिए अधिसूचित किया गया।
डीओआर बीटी-1 बैसिलस थुरिंगिएनसिस, कुर्सटरी (एच-3ए 3बी, 3सी) को अरंडी सेमीकूपर के प्रबंधन के लिए विकसित कर भारत सरकार के केंद्रीय कीटनाशक बोर्ड के पास व्यापारिक नाम केएनओसीके डब्लूपी से व्यवसायीकरण के लिए पंजीकृत किया गया। डीआरएसएच-1 (42-44%) तेल और हेक्टेयर में 1300-1600 कि.ग्रा. उपज देनेवाले हाइब्रिड को रबी के लिए पूरे भारत में जारी किया गया। सैफ्लावर हाइब्रिड एनएआरआई-एच-15 जिसका उत्पादन एक हेक्टेयर में 2200 कि.ग्रा. तक है और तेल की मात्रा 28% है, जारी की गई। प्रतिरोधक वाली किस्म जेएसएफ-99 आल्टरनेटिव मध्य देश के लिए जारी की गई। अरंडी उगाने वाले सभी क्षेत्रों के लिए डीसीएच-519 और सागरशक्ति जारी की गई। सोयाबीन की तीन उन्नत किस्में पीएस 134 और पीआरएस-1 (उत्तरांचल) और जेएस 95-60 (मध्य प्रदेश) जारी की गई।
बीटी कपास किस्में बीकानेरी नरमा और एनएचएच 44 बीसी कपास हाइब्रिड विकसित की गई। कम लागत वाली खुंव उत्पादन के लिए फफूंद एस थर्मोफिटम के उपयोग कंपोस्ट उत्पादन की विधि विकसित की गई।
एकीकृत कीट प्रबंधन (आईपीएम) की रणनीति देश भर के कपास उत्पादक नौ राज्यों के 2360 हेक्टेयर परंपरागत कपास, 605 हेक्टेयर बीटी काटन क्षेत्र 12 प्रदर्शन केंद्रों से प्रचारित की गई। आईपीएम की रणनीतियां किसानों को समझाने और उत्तरी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए चार केंद्र स्थापित किए गए।
कीट प्रबंधन सूचना प्रणाली (पीएमआईएस) कीट नियंत्रण और आईपीएम रणनीतियों के बारे में पूर्ण जानकारी सहित कंप्यूटर आधारित प्रणाली कपास, बैंगन और भिंडी के लिए विकसित की गई है, जिसमें जरूरी वस्तुओं की उपलब्धता के बारे में बताया गया है। निर्णय में सहायक साफ्टवेयर (कीटनाशक सलाहकार) भी विकसित किया गया, जिसमें उपलब्ध कीटनाशकों के बारे में पूरी सूचना है।
लार्जिडेइ, पिरोकोरिडेइ और खरकोपीडेइ के जीनस और प्रजातियों के लिए टैक्सोनामिक आधार विकसित किया गया।
शहद फसल के परागण के लिए डंकहीन मधुमक्खियों, ट्रिगोना दूरीडिपेनिस के बारे में केरल कृषि विश्वविद्यालय में अनुसंधान के फलस्वरूप कृत्रिम घोंसला सामग्री के रूप में मिट्टी के बर्तन, बांस की खपच्चियों और पीवीसी को विकसित किया गया।
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स्रोत: राष्ट्रीय पोर्टल विषयवस्तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 07-01-2011

