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बहुपक्षीय आर्थिक संबंध

आलोच्‍य अवधि के दौरान बहुपक्षीय संबंधों की कार्यसूची पर आमतौर से अंतर्राष्‍ट्रीय वित्तीय संकट, खाद्य वस्‍तुओं के ऊंचे दामों और ऊर्जा के मूल्‍यों में उतार-चढ़ाव का प्रभाव पड़ा। भारत ने असेम (एशिया-यूरोप बैठक), बिमस्‍टेक (बहुक्षेत्रीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी के प्रयास), ब्रिक (भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका), आईओआर-एआरसी (क्षेत्रीय सहयोग के लिए हिंद महासागर परिधीय राष्‍ट्र संगठन), एसीडी (एशिया सहयोग वार्ता) आदि संगठनों के साथ सक्रिय भागीदारी जारी रखी। जहां कहीं वित्तीय संकट और अन्‍य महत्‍वपूर्ण मुद्दों, जैसे खाद्य, सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन और स्‍थायी विकास के बारे में भारत को अपना पक्ष प्रस्‍तुत करना पड़ा तो उसने उपरोक्‍त संगठनों के साथ भागीदारी और सहयोग का ध्‍यान रखा। प्रथम आईओआर-एआरसी फिल्‍म समरोह का आयोजन मार्च, 2007 में तेहान में सातवीं आईओरआर-एआरसी मंत्रीपरिषद में भारत द्वारा घोषित उपायों के हिस्‍से के सिलसिले में किया गया।

सचिव (ईआर) ने 10-11 मार्च, 2008 के दौरान रियो-द-जेनेरियों में आयोजित ब्रिक देशों के उपविदेश मंत्रियों की तैयारी बैठक में भारतीय शिष्‍टमंडल का नेतृत्व किया। बैठक का आयोजन मई, 2008 में ब्रिक विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक की कार्यसूची तैयार करना था।

भारत ने इस अवधि के दौरान दूसरे बिमस्‍टे (13/11/2008) और तीसरे इब्‍सा सम्‍मेलन, का आयोजन नई दिल्‍ली में किया। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने पेचिंग में असेम सम्‍मेलन, वाशिंगटन (15/11/2008) में जी-20 देशों के शिखर सम्‍मेलन में भारतीय शिष्‍टमंडल का नेतृत्‍व किया और ब्रिक देशों के राष्‍ट्र/शासनाध्‍यक्षों के साथ अनौपचारिक बातचीत की। भारत और आसियान के बीच व्‍यापक आर्थिक सहयोग समझौते (सीईसीए) के अंतर्गत "वस्‍तुओं में व्‍यापार" के बारे में समझौते के लिए बातचीत का पूरा होना भारत 'पूर्वाभिमुखी नीति' की एक अन्‍य महत्‍वपूर्ण उपलब्‍धि रही।

भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम एवं विकास भागीदारी (डीपी)

भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम भारत के तकनीकी और आर्थिक सहयोग प्रयासों के अंतर्गत एक प्रमुख कार्यक्रम है। भारत की बढ़ती आर्थिक शक्‍ति और अंतर्राष्‍ट्रीय भूमिका को देखते हुए, भागीदार देशों के लिए भारत के तकनीकी सहयोग और विकास सहायता में बढ़ोतरी की गई और उसका विस्‍तार किया गया। इसमें क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी हस्‍तांतरण और अनुभवों के आदान-प्रदान पर विशेष बल दिया गया। इस सहयोग के दायरे में 158 विकासशील देश शामिल थे, जिनमें 139 देश आईटीईसी के अंतर्गत एशिया, अफ्रीका, मध्‍य एशिया, पूर्वी यूरोप और लैटिन अमेरिका से संबंद्ध थे जबकि 19 देश एससीएएपी (अफ्रीकी देशों के लिए विशेष राष्‍ट्रमंडल सहायता कार्यक्रम) के अंतर्गत अफ्रीका से संबंद्ध थे। 158 विकासशील देशों में करीब 5000 व्‍यवसायियों ने भारत में सरकारी और निजी क्षेत्र के संस्‍थानों द्वारा सिविल और सैन्‍य प्रशिक्षण कार्यक्रमों के अंतर्गत संचालित 200 से अधिक पाठ्यक्रमों में हिस्‍सा लिया। ये व्‍यवसायी सरकारी और अन्य क्षेत्रों से संबंद्ध थे। अफ्रीका, आईओआर-एआरसी, सीआईएस, अफगानिस्‍तान, लाओ पीडीआर और यमन के लिए प्रबंधन, डब्‍ल्‍यूटीओ मुद्दों, श्रम, लेखा परीक्षा आदि विभिन्‍न विषयों में विशिष पाठ्यक्रम भी आयोजित किए गए। सूचना प्रौद्योगिकी, लेखा परीक्षा, कानूनी विशेषज्ञता, औषधि विज्ञान, सांख्‍यिकी और जनसांख्‍यिकी, लोक प्रशासन, वस्‍त्र और कृषि जैसे विविध क्षेत्रों में भारतीय विशेषज्ञों को परामर्श एवं सहायता के लिए नियुक्‍त किया गया। वर्ष के दौरान सूचाना प्रौद्योगिकी, लघु एवं मध्‍यम उद्यमों, सिविल निर्माण और व्‍यवसायिक प्रशिक्षण के क्षेत्र में विश्‍व के विभिन्‍न भागों में अनेक परियोजनाएं चलाई गई। भूकंप, चक्रवात, बाढ़ आदि से पीड़ित देशों की मानवीय सहायता भी पहुंचायी गयी।

निवेश और प्रौद्योगिकी संवर्द्धन (आईटीपी)

आर्थिक कूटनीति भारत की विदेश नीति का एक महत्‍वपूर्ण घटक है। दिन-व-दिन परस्‍पर निर्भर और परस्‍पर संबद्ध होते जा रहे विश्‍व में आर्थिक कूटनीति पर विशेष ध्‍यान केंद्रित किया गया। मंत्रालय ने आईटीपी डिवीजन के जरिए विदेशी निवेश और व्‍यापार को प्रोत्‍साहित एवं सुगम बनाने के लिए गहन प्रयास किए। आईटीपी ने विदेशी निवेश संबर्द्धन बोर्ड की नीति संबंधी बैठकों और औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग तथा अर्थव्‍यवस्‍था में सुधार और उदारीकरण संबंधी अन्‍य नीतिगत बैठकों और निवेश प्रक्रिया सरलीकरण संबंधी बैठकों में हिस्‍सा लिया। आईटीपी डिवीजन ने भारत में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाने के सरकार के प्रयासों में पूरक भूमिका निभाई। उसने निवेशक समुदाय से संपर्क किया और निजी क्षेत्र, शीर्ष व्‍यापार मंडलों और विदेश स्‍थित भारतीय मिशनों के माध्‍यम से प्रोत्‍साहन गतिविधियों का आयोजन किया और उनके लिए धन की व्‍यवस्‍था की। विशेष प्रकाशनों के जरिए देश की छवि को निवेश के अनुकूल प्रस्‍तुत करते हुए विदेशी निवेश के लक्ष्‍य को और बढ़ावा दिया गया। इन प्रकाशनों में "इंडिया बिजनेस पार्टनर : इंवेस्‍टर फ्रेंडली डेस्‍टिनेशन" आदि शामिल थे। इसके अतिरिक्‍त आईटीपी डिविजन की वेब साइट (www.indiainbusiness.nic.in (बाहरी वेबसाइट जो एक नई विंडों में खुलती हैं)) का भी सहारा लिया गया।

लैटिन अमेरिका, अफ्रीका और एशिया में विकासशील देशों को अनुदान और लाइन ऑफ क्रेडिट (एलओसी) (ऋण सहायता) सहित विकास सहायता हमारी आर्थिक कूटनीति का महत्‍वपूर्ण घटक है। सहायता करने वाली भारतीय कंपनियों को इन विकासशील देशों में परियोजनाओं के अनुबंध और वस्‍तुओं की आपूर्ति के आर्डर मिले। वहीं दूसरी और एलओसी यानी ऋण सहायता से इन क्षेत्रों में ढांचागत विकास में मदद मिली, जिससे भारत के प्रति काफी सद्भाव पैदा हुआ। 2008-09 के दौरान 16 विकासशील देशों के लिए 74.4 करोड़ अमरीकी डॉलर मूल्‍य के 17 ऋण मंजूर किए गए।

भारत के विकास के लिए ऊर्जा सुरक्षा के महत्‍व को देखते हुए मार्च, 2009 में पृथक ऊर्जा सुरक्षा डिविजन बनाया गया ताकि ऊर्जा मंत्रालयों और विदेश स्‍थित भारतीय मिशनों के साथ समन्‍वय स्‍थापित किया जा सके। इस डिविजन ने पेट्रोलियम गैस मंत्रालय के साथ मिलकर कार्यक्रम आयोजित किए। इनमें नवंबर, 2008 में हाइड्रोकार्बन के बारे में भारत-सीआईएस गोल मेज सम्मेलन और पेट्रोटेक-2009, भारत के ऊर्जा विकल्‍पों के बारे में सेमिनारों का आयोजन/सह-आयोजन, अधिक ऊर्जा वाले देशों और देशों और क्षेत्रों के बारे में अध्‍ययनों का संचालन जैसे कार्यक्रम शामिल थे। अन्‍य मंत्रालयों और वाणिज्‍य एवं उद्योग मंडलों द्वारा आयोजित ऊर्जा सुरक्षा संबंधी सेमिनारों/सम्‍मेलनों में भी डिविजन की सक्रिय भागीदारी रही। इसने विदेश में ऊर्जा सहयोग और अवसरों के लिए काम करने वाली भारतीय कंपनियों को भी सहायता पहुंचायी। डिविजन ने तेल और बुनियादी सुविधाओं से संबद्ध सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्‍ठानों के वरिष्‍ठ प्रतिनिधियों के साथ मिलकर ऊर्जा के बारे में कार्यदल के गठन की भी पहल की।

नीति आयोजना और अनुसंधान

नीति आयोजना और अनुसंधान यानी पीपी एंड आर डिविजन ने नीति अनुसंधान और विश्‍लेषण में विशेषज्ञता रखने वाले संस्‍थानों और व्‍यक्‍तियों के साथ घनिष्‍ठ सहयोग बनाए रखा और देश के विभिन्‍न भागों में स्‍थित शैक्षिक संस्‍थानों/विचारकों को वित्तीय सहायता प्रदान की ताकि वे हमारी विदेश नीति की आयोजना, प्रारूपण और कार्यान्‍वयन के लिए बहुमूल्य जानकारी जुटाने के वास्ते सम्मेलनों, सेमिनारों का आयोजन कर सके, अनुसंधान पेपर तैयार कर सकें, भारत के विदेश संबंधों और सुरक्षा से संबंधित मुद्दों के बारे में विद्वानों का आदान-प्रदान कर सकें।

नीति आयोजना और अनुसंधान डिविजन ने कैबिनेट को मासिक विवरण भेजना जारी रखा। डिविजन ने मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट का संपादन और प्रकाशन भी किया। यह रिपोर्ट अंतर्राष्‍ट्रीय संबंधों के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में सरकार के दृष्‍टिकोण सहित राजनीतिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक क्षेत्रों में शेष विश्‍व के साथ भारत के परस्‍पर संपर्क का सार-संग्रह है।

वाणिज्‍यदूत, पासपोर्ट और वीजा सेवाएं

वर्ष के दौरान अमृतसर, देहरादून और कोयम्‍बटूर में 3 नये पासपोर्ट कार्यालय खोले गए। सभी 37 पासपोर्ट कार्यालय कंप्‍यूटरीकृति है और वे मशीन-मुद्रित तथा मशीन पठित पासपोर्ट जारी करते हैं।

2008-09 के दौरान कुल 53.15 लाख पासपोर्ट जारी किये गए, जिसमें 2007-08 में जारी पासपोर्ट की तुलना में करीब 6.5 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई। सभी पासपोर्ट कार्यालयों से अर्जित धन भी बढ़कर 606 करोड़ रुपये पर पहुंच गया और उसमें 2007-08 की तुलना में करीब 5.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई।

मंत्रालय लोगों की सुविधा और आराम के लिए शीघ्रता और आसानी के साथ पासपोर्ट जारी किए जाने के वास्‍ते अनेक उपाय कर रहा है। जिला स्‍तर पर जिला पासपोर्ट प्रकोष्‍ठ कायम किये गए हैं ताकि प्राप्‍ति और जांच की प्रक्रिया की कार्यक्षमता बढ़ाई जा सके। सभी पासपोर्ट कार्यालयों में पासपोर्ट के आवेदन ऑन लाइन प्रस्‍तुत करने की प्रणाली शुरू की गई है। 2008 के दौरान आवेदकों की सहायता तथा उनकी शिकायतों/कठिनाइयों का तेजी से समाधान करने के लिए सुविधा काउंटरों और हेल्‍प डेस्कों की भी स्‍थापना की गई।

भारत सरकार द्वारा पासपोर्ट सेवा परियोजना प्रारंभ की गई है। जिससे उम्‍मीद की जा रही है कि पुलिस जांच के बाद तीन दिन के भीतर नये पासपोर्ट कर दिए जाएंगे और पासपोर्ट संबंधी सभी अन्‍य सेवाएं एक दिन में उपलब्‍ध करा दी जायेंगी। प्रायोगिक परियोजना जुलाई-अगस्‍त, 2009 तक चंडीगढ़ और बैंगलोर में प्रारंभ हो जाने की उम्‍मीद है। 2010 तक इसे समूचे देश में लागू कर दिया जायेगा।

मंत्रालय ने विदेश स्‍थित 140 भारतीय मिशनों/चौकियों के संदर्भ में सीपीवी डिविजन, नई दिल्‍ली में मशीन पठित पासपोर्टों के केंद्रीकृत मुद्रण के लिए एक परियोजना सफलता पूर्वक कार्यान्‍वित की है।

प्रायोगिक परियोजना के हिस्‍से के रूप में अब अभी कूटनीतिक और सरकारी पासपोर्ट ई-पासपोर्ट के रूप में जारी किए जा रहे हैं। प्रायोगिक परियोजना से प्राप्‍त अनुभव के आधार पर 2009 के अंत तक सामान्‍य श्रेणी में भी ई-पासपोर्ट प्रणाली शुरू किये जाने का प्रस्‍ताव है। 2008 के दौरान मिस्र, अलसल्‍वाडोर, होंडुरास, निकारागुआ, दक्षिण अफ्रीका और तुर्की के साथ वीजा-छूट समझौतों पर हस्‍ताक्षर किये गए।

ब्राजील, आस्‍ट्रेलिया, ईरान और मिस्र के साथ प्रत्‍यर्पण संधियों पर हस्‍ताक्षर किए गए। चेन्‍नई, हैदराबाद, कोलकाता और गोवाहाटी स्‍थित मंत्रालय के शाखा सचिवालय कार्यालयों में 15 जून, 2008 से दस्‍तावेज के सत्‍यापन और टिप्‍पण की प्रक्रिया भी शुरू की गई है। वर्ष के दौरान मंत्रालय द्वारा 1,70,000 व्‍यक्‍तिगत और शैक्षिक दस्‍तावेज तथा 1,71,000 वाणिज्‍यिक दस्‍तावेज का सत्‍यापन किया गया। इसके अतिरिक्‍त 80,000 दस्‍तावेज अपॉस्‍टल किये गए, ताकि उनका इस्‍तेमाल विदेश में सदस्‍य देशों द्वारा किया जा सके।

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स्रोत: राष्‍ट्रीय पोर्टल विषयवस्‍तु प्रबंधन दल, द्वारा समीक्षित: 21-04-2011